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ECLGS 5.0 से MSME सेक्टर को बड़ी राहत, छोटे उद्योगों को मिलेगा नया सहारा

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सरकार ने MSME सेक्टर के लिए आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS 5.0) को बढ़ाने का फैसला लिया है। उद्योग संगठनों ने इसे राहत भरा कदम बताया है, जिससे छोटे उद्योगों, मैन्युफैक्चरिंग और स्टार्टअप्स को बड़ी मदद मिलने की उम्मीद है।

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक व्यापारिक अनिश्चितताओं के बीच केंद्र सरकार ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) क्षेत्र को राहत देने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना यानी ईसीएलजीएस 5.0 को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी है। उद्योग जगत ने इसे समय की जरूरत बताते हुए कहा है कि यह फैसला लाखों छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए नई ऊर्जा और आर्थिक सहारा लेकर आएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर बढ़ रहे तनाव का सबसे ज्यादा असर उन उद्योगों पर पड़ता है जो आयात-निर्यात, कच्चे माल, तेल आधारित परिवहन और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन पर निर्भर हैं। ऐसे समय में सरकार का यह कदम उद्योगों के लिए तरलता बनाए रखने, रोजगार बचाने और उत्पादन को स्थिर रखने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

उद्योग संगठनों के अनुसार, इस योजना से मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग, ऑटो कंपोनेंट्स, टेक्सटाइल, फार्मा, हेल्थकेयर, फूड प्रोसेसिंग, एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री, लॉजिस्टिक्स, स्टार्टअप्स और सेवा क्षेत्र को सबसे ज्यादा फायदा मिलने की संभावना है। इन सेक्टरों में बड़ी संख्या में छोटे उद्यम काम करते हैं, जो बाजार में हल्की गिरावट या सप्लाई बाधा से भी सीधे प्रभावित हो जाते हैं।

महाराष्ट्र उद्योग एवं व्यापार संघ के चैंबर के अध्यक्ष दीपेन अग्रवाल ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने आयात-निर्यात आधारित कारोबार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। कई उद्योगों के सामने उत्पादन घटाने या कारोबार बंद करने जैसी स्थिति बन रही थी। ऐसे समय में ईसीएलजीएस 5.0 का विस्तार उद्योगों को राहत देने वाला कदम है।

उन्होंने कहा कि योजना के तहत पात्र उद्योग अपनी उपयोग की गई कार्यशील पूंजी का 20 प्रतिशत तक अतिरिक्त ऋण ले सकते हैं, जिसकी अधिकतम सीमा 100 करोड़ रुपये रखी गई है। इससे उद्योगों को जरूरी नकदी उपलब्ध होगी और वे वेतन, उत्पादन, परिवहन तथा सप्लाई चेन जैसी आवश्यक गतिविधियों को जारी रख सकेंगे।

उद्योग जगत का मानना है कि सरकार ने यह फैसला ऐसे समय में लिया है जब वैश्विक बाजार में अस्थिरता लगातार बढ़ रही है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, समुद्री परिवहन पर असर और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर तनाव का असर भारतीय एमएसएमई सेक्टर पर भी दिखाई देने लगा है। ऐसे में यह योजना छोटे उद्योगों को आर्थिक झटका लगने से बचाने में मदद कर सकती है।

महाराष्ट्र चैंबर ऑफ कॉमर्स, इंडस्ट्रीज एंड एग्रीकल्चर के अध्यक्ष ललित गांधी ने कहा कि सरकार का यह निर्णय उद्योग जगत में विश्वास पैदा करने वाला है। उनके मुताबिक यह योजना केवल आर्थिक मदद नहीं बल्कि उद्योगों के लिए भरोसे का संकेत भी है कि सरकार संकट के समय उनके साथ खड़ी है।

हालांकि उद्योग संगठनों ने कुछ चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि केवल योजना बढ़ा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी बराबर ध्यान देना जरूरी है। कई बैंक अब भी गारंटी योजना होने के बावजूद बड़े पैमाने पर कोलेटरल यानी संपत्ति गिरवी रखने की मांग करते हैं। इससे छोटे उद्यमियों को ऋण लेने में कठिनाई होती है।

उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए कि गारंटी वाले ऋणों में अनावश्यक दस्तावेज और अतिरिक्त गारंटर की मांग न की जाए। साथ ही ऋण स्वीकृति प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और उद्योग-अनुकूल बनाया जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो योजना का वास्तविक लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचने में दिक्कत आ सकती है।

भारत मर्चेंट्स चैंबर के अध्यक्ष मनोज जालान ने भी सरकार के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि यह योजना छोटे उद्योगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि उन्होंने यह चिंता भी जताई कि कई बार बड़ी कंपनियां और प्रभावशाली कारोबारी ऐसी योजनाओं का अधिक लाभ उठा लेते हैं, जबकि वास्तविक जरूरत छोटे उद्यमियों को होती है।

उन्होंने कहा कि छोटे उद्योगों को अब भी बैंकिंग स्तर पर कई व्यवहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। प्रॉपर्टी मॉर्गेज, अतिरिक्त गारंटर और लंबी दस्तावेजी प्रक्रिया की वजह से कई उद्योग सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते। इसलिए योजना के साथ-साथ बैंकिंग व्यवस्था में सुधार भी आवश्यक है।

इस बीच स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की हालिया रिपोर्ट ने भी इस योजना को महत्वपूर्ण बताया है। रिपोर्ट के अनुसार ईसीएलजीएस 5.0 से लगभग 1.1 करोड़ एमएसएमई खातों को फायदा मिल सकता है। इससे पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण पैदा हुई आर्थिक बाधाओं से उबरने में मदद मिलेगी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पात्र उद्योग वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में उपयोग की गई अधिकतम कार्यशील पूंजी के 20 प्रतिशत तक अतिरिक्त ऋण प्राप्त कर सकते हैं। वहीं विमानन क्षेत्र के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं, जिनमें प्रति उधारकर्ता 1,500 करोड़ रुपये तक की सहायता संभव है।

सरकार ने इस योजना के तहत कुल 2.55 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त ऋण प्रवाह का लक्ष्य रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे उद्योगों में नकदी संकट कम होगा, नौकरियां बचेंगी और सप्लाई चेन मजबूत बनी रहेगी।

एसबीआई रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026 में एमएसएमई ऋण में लगभग 27 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। कुल बैंकिंग ऋण में एमएसएमई सेक्टर की हिस्सेदारी बढ़कर 18.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह संकेत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में छोटे और मध्यम उद्योगों की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि पिछली ईसीएलजीएस योजना के कारण करीब 13.5 लाख एमएसएमई खातों को एनपीए बनने से बचाया जा सका था। इससे साफ है कि यह योजना केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि उद्योगों को संकट से उबारने का सुरक्षा कवच भी बन चुकी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और बैंक मिलकर इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू करते हैं तो यह न केवल एमएसएमई सेक्टर को मजबूती देगी बल्कि “मेक इन इंडिया”, निर्यात वृद्धि और रोजगार सृजन जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को भी गति प्रदान करेगी।

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